भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा नवंबर 2025 के अंत में जारी किए गए एक गोपनीय निर्देश ने देश के तकनीकी जगत और नागरिक समाज में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया था। इस निर्देश के तहत भारत में बिकने वाले सभी नए स्मार्टफोन्स में सरकार के साइबर सुरक्षा ऐप 'संचार साथी' (Sanchar Saathi) को अनिवार्य रूप से पहले से इंस्टॉल (Pre-install) करने और इसे डिलीट न किए जाने योग्य बनाने का आदेश दिया गया था। हालांकि, डिजिटल अधिकारों के कार्यकर्ताओं की तीखी आलोचना, उपयोगकर्ता गोपनीयता पर उठते गंभीर सवालों और ऐपल व गूगल जैसी वैश्विक तकनीकी दिग्गज कंपनियों के कड़े विरोध के बाद सरकार को 3 दिसंबर 2025 को इस फैसले को वापस लेना पड़ा। इस लेख में हम इस पूरे विवाद, सरकार के मूल आदेश, तकनीकी कंपनियों के रुख, गोपनीयता संबंधी चिंताओं और इस निर्णय के भारतीय मोबाइल उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
- मूल सरकारी आदेश: 28 नवंबर 2025 को जारी निर्देश में मोबाइल निर्माताओं को नए उपकरणों में गैर-हटाने योग्य (non-deletable) संचार साथी ऐप को प्री-लोड करने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया था।
- तीव्र जन विरोध और वापसी: गोपनीयता कार्यकर्ताओं और तकनीकी कंपनियों के दबाव के बाद, सरकार ने 3 दिसंबर 2025 को इस आदेश को आधिकारिक रूप से वापस ले लिया और ऐप को स्वैच्छिक बना दिया।
- व्यापक सुरक्षा डेटा: संचार साथी के माध्यम से अब तक 3.4 करोड़ से अधिक संदिग्ध कनेक्शन काटे जा चुके हैं और 53.12 लाख से अधिक खोए हुए मोबाइल उपकरणों को ब्लॉक किया गया है।
- गोपनीयता संबंधी आपत्तियां: इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) जैसी संस्थाओं ने ऐप द्वारा मांगी जाने वाली अत्यधिक अनुमतियों जैसे कॉल लॉग, एसएमएस, कैमरा और स्टोरेज एक्सेस पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।
- सहमति का सिद्धांत बहाल: अनिवार्यता हटने के बाद, अब उपयोगकर्ताओं के पास पूरी स्वतंत्रता है कि वे इस सुरक्षा ऐप को अपनी मर्जी से डाउनलोड करें या न करें।
संचार साथी ऐप और दूरसंचार विभाग (DoT) का मूल निर्देश: क्या था 28 नवंबर 2025 का गुप्त आदेश?
दूरसंचार विभाग (Department of Telecommunications - DoT) ने 28 नवंबर 2025 को भारत में मोबाइल हैंडसेट निर्माताओं और आयातकों को एक अत्यंत संवेदनशील और गोपनीय पत्र भेजा था। इस आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि भारत के भीतर बेचे जाने वाले सभी नए मोबाइल उपकरणों में सरकार द्वारा विकसित 'संचार साथी' मोबाइल एप्लीकेशन को पहले से स्थापित (pre-install) किया जाए। आदेश की सबसे विवादित बात यह थी कि उपयोगकर्ताओं को इस ऐप को अपने फोन से अनइंस्टॉल (uninstall) या पूरी तरह से अक्षम (disable) करने की अनुमति नहीं दी जानी थी। यह नियम ठीक उसी तरह काम करने वाला था जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम के अपने कोर सिस्टम ऐप्स काम करते हैं, जिन्हें चाहकर भी डिलीट नहीं किया जा सकता।
सरकार ने इस निर्देश को लागू करने के लिए निर्माताओं को 90 दिनों की समय-सीमा दी थी और इस अनुपालन की पूरी रिपोर्ट 120 दिनों के भीतर विभाग को सौंपने के लिए कहा था। विभाग का तर्क था कि यह कदम देश में बढ़ते ऑनलाइन वित्तीय घोटालों, फर्जी पहचान पत्रों पर सिम कार्ड जारी करने की प्रवृत्ति, और चोरी के मोबाइल फोनों की री-मार्केटिंग को रोकने के लिए अत्यंत आवश्यक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यह ऐप नकली या स्पूफ़्ड इंटरनेशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी (IMEI) नंबरों से होने वाले खतरों से निपटने के लिए एक ढाल का काम कर सकता था। लेकिन जैसे ही यह निर्देश सार्वजनिक हुआ, इसके कानूनी और तकनीकी पहलुओं को लेकर पूरे देश में चिंताएं बढ़ने लगीं।
दूरसंचार क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के एकतरफा आदेश ने मोबाइल उद्योग को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था। भारत जैसे विशाल बाजार में, जहां हर महीने लाखों नए हैंडसेट बिकते हैं, इतने कम समय में सॉफ्टवेयर स्तर पर बड़े बदलाव करना और उसे सिस्टम-लेवल ऐप बनाना निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती थी। इसके अतिरिक्त, इस आदेश ने सुरक्षा और नीतिगत स्तर पर कई नए तकनीकी सवाल खड़े किए, जिनका जवाब देने के लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था।
सिटिजन-सेंट्रिक सुरक्षा बनाम सर्विलांस का खतरा: डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और IFF की मुख्य आपत्तियां
जैसे ही दूरसंचार विभाग के इस गुप्त आदेश की खबर मीडिया और इंटरनेट जगत में फैली, वैसे ही डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इस पर तीखा विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया। भारत की प्रमुख डिजिटल राइट्स संस्था 'इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन' (IFF) ने इस निर्देश को नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गोपनीयता के खिलाफ एक बड़ा खतरा बताया। IFF के संस्थापक-निदेशक अपार गुप्ता ने इस मुद्दे पर सरकार की पारदर्शिता की कमी की आलोचना करते हुए कहा कि इतने बड़े और व्यापक नीतिगत फैसले को बिना किसी सार्वजनिक या विधायी बहस के लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अनुकूल नहीं है।
गोपनीयता कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी आपत्ति ऐप द्वारा मांगी जाने वाली अनुमतियों (Permissions) को लेकर थी। तकनीकी विश्लेषण से पता चला कि संचार साथी ऐप को चलाने के लिए उपयोगकर्ताओं को अपने कॉल लॉग (Call Logs), टेक्स्ट मैसेज (SMS), कैमरा (Camera), और फोन स्टोरेज (Device Storage) जैसी बेहद संवेदनशील अनुमतियां देनी पड़ती हैं। कार्यकर्ताओं का तर्क था कि केवल मोबाइल हैंडसेट के IMEI नंबर को सत्यापित करने या खोए हुए फोन की रिपोर्ट करने जैसे बुनियादी कार्यों के लिए इतने व्यापक डेटा एक्सेस की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जब यह ऐप फोन में हमेशा मौजूद रहेगा और इसे डिलीट भी नहीं किया जा सकेगा, तो यह सरकार को एक प्रकार का 'स्थायी सर्विलांस बैकडोर' (Permanent Surveillance Backdoor) प्रदान कर देगा।
इसके साथ ही, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) के तहत नियमों का भी हवाला दिया गया। कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई कि जहां निजी कंपनियों के लिए डेटा संरक्षण और उपयोगकर्ता सहमति के अत्यंत कड़े नियम बनाए गए हैं, वहीं सरकारी सुरक्षा एजेंसियों को इन नियमों से व्यापक छूट दी गई है। इस असंतुलन के कारण, नागरिकों के पास अपने डेटा के गलत इस्तेमाल के खिलाफ कोई मजबूत सुरक्षा कवच नहीं रह जाता। इस प्रकार, सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत डेटा पर सरकारी नियंत्रण की इस कोशिश को सीधे तौर पर निजता के अधिकार का हनन माना गया।
सैमसंग, ऐपल और गूगल जैसी टेक कंपनियों का विरोध और वैश्विक नीतियों का टकराव
इस सरकारी आदेश का केवल नागरिक समाज ने ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों ने भी कड़ा विरोध किया। अमेरिकी टेक दिग्गज कंपनी ऐपल (Apple) और गूगल (Google) ने इस आदेश को अपनी वैश्विक उपयोगकर्ता नीतियों और ऑपरेटिंग सिस्टम के बुनियादी ढांचे के खिलाफ माना। ऐपल के पास अपनी वैश्विक नीतियां हैं, जो किसी भी देश की सरकार या तीसरे पक्ष के ऐप्स को आईफोन (iPhone) की बिक्री से पहले डिवाइस में प्री-लोड करने से स्पष्ट रूप से रोकती हैं। ऐपल का मानना है कि प्री-इंस्टॉल्ड सरकारी ऐप्स न केवल उनके क्लोज्ड इकोसिस्टम की सुरक्षा को कमजोर करते हैं, बल्कि उनके उपभोक्ताओं के भरोसे को भी आघात पहुंचाते हैं।
प्रसिद्ध तकनीकी बाजार अनुसंधान फर्म 'काउंटरपॉइंट' (Counterpoint) के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक ने इस गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐपल ने ऐतिहासिक रूप से अन्य देशों में भी सरकारों की ऐसी मांगों को खारिज किया है। उन्होंने संकेत दिया था कि कंपनियां इस दिशा में सरकार के साथ बातचीत करके एक मध्यम मार्ग तलाशने की कोशिश करेंगी, जिसमें अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन के बजाय उपयोगकर्ताओं को स्वैच्छिक रूप से ऐप डाउनलोड करने के लिए प्रेरित (nudge) करने का विकल्प शामिल हो। दूसरी ओर, गूगल की एंड्रॉइड (Android) टीम ने भी इस बात पर चिंता जताई कि ऑपरेटिंग सिस्टम के कोर सिस्टम में किसी तीसरे पक्ष के ऐप को गैर-हटाने योग्य बनाना सुरक्षा पैच और भविष्य के अपडेट्स को प्रभावित कर सकता है।
वैश्विक स्तर पर, रूस जैसे कुछ देशों में पहले ऐसे कानून बनाए गए थे जहां राज्य-समर्थित सॉफ़्टवेयर को स्मार्टफ़ोन में पहले से लोड करना अनिवार्य किया गया था। लेकिन भारत जैसी उभरती हुई डिजिटल महाशक्ति में इस तरह के नियमों को लागू करना वैश्विक कंपनियों के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकता था। कंपनियों ने सरकार को स्पष्ट रूप से अवगत कराया कि इस अनिवार्यता से न केवल मोबाइल की विनिर्माण लागत बढ़ सकती है, बल्कि उपयोगकर्ताओं के समग्र सुरक्षा अनुभव के साथ भी समझौता हो सकता है।
डेटा और सांख्यिकी: संचार साथी पोर्टल (CEIR) और साइबर फ्रॉड के खिलाफ जंग के बड़े आंकड़े
भले ही इस ऐप की अनिवार्यता को लेकर विवाद गहरा गया हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 'संचार साथी' पोर्टल ने दूरसंचार सुरक्षा के क्षेत्र में असाधारण सफलता हासिल की है। दूरसंचार विभाग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस पोर्टल के लॉन्च होने के बाद से भारत में साइबर अपराधों और सिम कार्ड के दुरुपयोग पर लगाम लगाने में भारी मदद मिली है। पोर्टल के विभिन्न सुरक्षा उपकरणों के माध्यम से अब तक करोड़ों की संख्या में संदिग्ध और फर्जी मोबाइल कनेक्शनों को ब्लॉक किया गया है, जिसने भारतीय डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली को बड़ी राहत दी है।
अगर हम इन आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करें, तो सबसे अधिक कार्रवाई फर्जी सिम कार्डों के खिलाफ की गई है। दूरसंचार विभाग के अनुसार, कुल 3.4 करोड़ (34 Million) संदिग्ध मोबाइल कनेक्शनों को पूरी तरह से निष्क्रिय कर दिया गया है। इन कनेक्शनों को काटने के पीछे अलग-अलग कारण और तकनीकें थीं। इनमें से सबसे बड़ी संख्या उन सिम कार्डों की थी जो व्यक्तिगत उपयोगकर्ता सीमा का उल्लंघन कर रहे थे। भारतीय कानून के अनुसार एक व्यक्ति के नाम पर अधिकतम 9 मोबाइल कनेक्शन जारी किए जा सकते हैं, लेकिन डेटा विश्लेषण में पाया गया कि लाखों सिम कार्ड इस सीमा से अधिक सक्रिय थे। नीचे दी गई ग्राफिक तालिका इन सभी आकलनों को विस्तार से दर्शाती है।
इसके अतिरिक्त, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित 'अस्त्र' (ASTR - Artificial Intelligence and Facial Recognition Powered Solution for Telecom SIM Subscriber Verification) टूल का उपयोग करके 78 लाख से अधिक सिम कार्डों की पहचान की गई, जिनमें एक ही चेहरे का उपयोग करके अलग-अलग नामों से सिम खरीदे गए थे। वहीं, 16.97 लाख से अधिक ऐसे व्हाट्सएप (WhatsApp) खातों को भी बंद करवाया गया जो फर्जी कनेक्शनों के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे थे। इसके साथ ही, लगभग 20,000 से अधिक थोक एसएमएस (Bulk SMS) भेजने वाली कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया है।
तुलनात्मक विश्लेषण: अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन नियम बनाम स्वैच्छिक मॉडल
इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि सरकार के अनिवार्य निर्देश और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले स्वैच्छिक मॉडल में क्या अंतर थे। नीचे दी गई तालिका में दोनों मॉडलों का एक व्यापक तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अंततः स्वैच्छिक मॉडल की जीत क्यों अधिक व्यावहारिक और स्वीकार्य रही:
| तुलना के मुख्य बिंदु (Key Metrics) | अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन नियम (DoT) | वर्तमान स्वैच्छिक मॉडल (Voluntary) | परिवर्तन का वास्तविक प्रभाव | तुलनात्मक स्थिति (Winner) |
|---|---|---|---|---|
| उपयोगकर्ता की सहमति (User Consent) | कोई विकल्प नहीं, ऐप हर फोन में अनिवार्य था। | पूरी तरह स्वैच्छिक, उपयोगकर्ता की इच्छा पर निर्भर। | नागरिकों को अपनी डिजिटल गोपनीयता पर नियंत्रण मिला। | ▲ Leading (स्वैच्छिक मॉडल) |
| अनइंस्टॉल करने का विकल्प (Uninstall Choice) | पूरी तरह प्रतिबंधित (Non-deletable)। | उपयोगकर्ता जब चाहें ऐप को हटा सकते हैं। | डिवाइस पर उपयोगकर्ता का मालिकाना हक सुरक्षित रहा। | ▲ Leading (स्वैच्छिक मॉडल) |
| टेक कंपनियों का अनुपालन (Tech Alliance) | कंपनियों की वैश्विक नीतियों के साथ सीधा टकराव। | कंपनियों की नीतियों और दिशा-निर्देशों के अनुकूल। | भारतीय मोबाइल बाजार में विनिर्माण स्थिरता बनी रही। | ▲ Leading (स्वैच्छिक मॉडल) |
| सुरक्षा और धोखाधड़ी से बचाव (Cyber Security) | 100% उपकरणों पर लागू होने से व्यापक ट्रैकिंग संभव थी। | केवल जागरूक और डाउनलोड करने वाले लोगों तक सीमित। | धोखाधड़ी रोकने का काम जारी है, पर गोपनीयता को ताक पर रखे बिना। | ≈ Parity (समान सुरक्षा बल) |
| डेटा सर्विलांस का खतरा (Surveillance Risk) | अधिकतम, क्योंकि ऐप को हटाया नहीं जा सकता था। | न्यूनतम, क्योंकि अनुमतियों को नियंत्रित किया जा सकता है। | सरकारी एजेंसियों द्वारा डेटा दुरुपयोग की संभावना घटी। | ▲ Leading (स्वैच्छिक मॉडल) |
इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि हालांकि अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन के जरिए सरकार देश के हर स्मार्टफोन तक अपनी सुरक्षा पहुंच बनाना चाहती थी, लेकिन इसके कारण जो अत्यधिक नियंत्रण और गोपनीयता संबंधी जोखिम उत्पन्न हो रहे थे, उन्हें देखते हुए स्वैच्छिक मॉडल ही सर्वोत्तम विकल्प था। सुरक्षा को नागरिकों पर जबरन थोपे जाने के बजाय उन्हें जागरूक बनाकर लागू करना ही एक परिपक्व डिजिटल लोकतंत्र की पहचान है।
आदेश की वापसी: 3 दिसंबर 2025 का ऐतिहासिक फैसला और सरकार का रुख
वैकल्पिक रूप से गोपनीयता के कड़े कानूनी सवालों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के कड़े रुख के सामने झुकते हुए, भारत सरकार ने 3 दिसंबर 2025 को एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। केंद्रीय संचार मंत्रालय ने एक संक्षिप्त प्रेस विज्ञप्ति जारी करके 28 नवंबर के अपने प्री-इंस्टॉलेशन आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया। सरकार ने अपने बचाव में यह स्पष्टीकरण दिया कि 'संचार साथी' एप्लीकेशन की बढ़ती लोकप्रियता और जनता के बीच इसकी भारी स्वीकार्यता के कारण अब किसी भी तरह की प्रशासनिक अनिवार्यता लागू करने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
"संचार साथी पोर्टल और इसके नागरिक-केंद्रित उपकरणों ने दूरसंचार धोखाधड़ी के खिलाफ हमारी लड़ाई को बहुत मजबूत किया है। इस एप्लीकेशन को जनता का जबरदस्त समर्थन मिला है और 1.4 करोड़ से अधिक लोगों ने स्वेच्छा से इसे डाउनलोड करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की है। इस भारी स्वैच्छिक भागीदारी को देखते हुए, सरकार ने अनिवार्य प्री-लोडिंग निर्देश को वापस लेने का फैसला किया है ताकि उपयोगकर्ता की स्वतंत्रता और बाजार की नीतियों का सम्मान किया जा सके।" — केंद्रीय संचार मंत्रालय, भारत सरकार (दिसंबर 2025)
सरकार के इस कदम का डिजिटल अधिकारों के समर्थकों और स्मार्टफोन उद्योग ने पुरजोर स्वागत किया। इसे व्यक्तिगत डेटा गोपनीयता के क्षेत्र में नागरिक अधिकारों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा गया। सरकार ने स्पष्ट किया कि भले ही अब यह ऐप फोन में पहले से इंस्टॉल होकर नहीं आएगा, लेकिन सभी प्रमुख सरकारी संचार चैनलों, मीडिया विज्ञापनों और नागरिक सेवा केंद्रों के माध्यम से लोगों को साइबर धोखाधड़ी से बचने के लिए इसे खुद डाउनलोड करने की सलाह दी जाती रहेगी। सुरक्षा को अनिवार्य कानून के बजाय एक स्वैच्छिक नागरिक जिम्मेदारी में बदलना इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सकारात्मक पहलू रहा।
- दूरसंचार विभाग (DoT) भारत सरकार आधिकारिक पोर्टल - sancharsaathi.gov.in
- इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) द्वारा जारी नीतिगत समीक्षा पत्र (2025)
- प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) भारत सरकार प्रेस विज्ञप्ति - 3 दिसंबर 2025
- ऐपल इंडिया (Apple India) और गूगल एंड्रॉइड सुरक्षा नीतियां दस्तावेज़ (2025-26)
- काउंटरपॉइंट टेक्नोलॉजी मार्केट रिसर्च रिपोर्ट (Counterpoint Research, 2025)