भारतीय व्यापार जगत और विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। प्रतिष्ठित वित्तीय संस्था सीपीए ऑस्ट्रेलिया (CPA Australia) के 16वें वार्षिक एशिया-प्रशांत लघु व्यवसाय सर्वेक्षण (Asia-Pacific Small Business Survey) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारतीय लघु उद्योगों ने वर्ष 2025 के दौरान महामारी के बाद से अपनी सबसे मजबूत विकास दर दर्ज की है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 80 प्रतिशत छोटे व्यवसायों ने पिछले वर्ष के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र के औसत 63 प्रतिशत से काफी अधिक है। यह रिपोर्ट भारतीय आर्थिक परिदृश्य में लघु और मध्यम स्तर के उद्यमों की बढ़ती ताकत, डिजिटल अनुकूलन क्षमता और भविष्य के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।
- अभूतपूर्व विकास दर: वर्ष 2025 में 80% भारतीय लघु उद्यमों ने अपने कारोबार में बढ़ोतरी दर्ज की, जो महामारी के बाद का उच्चतम स्तर है।
- डिजिटल भुगतान में शीर्ष स्थान: लगभग 89% भारतीय छोटे व्यवसाय डिजिटल भुगतान के माध्यम से अपने कुल राजस्व का 10% से अधिक हिस्सा प्राप्त करते हैं, जो सभी 11 सर्वेक्षण बाजारों में सबसे अधिक है।
- रोजगार और भर्ती में तेजी: भारत के 50% से अधिक व्यवसायों ने 2025 में अपने कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि की, और लगभग 69% उद्यमों ने 2026 में नई भर्तियों की योजना बनाई है।
- बढ़ती परिचालन लागत: लगभग 42% छोटे व्यवसायों ने माना कि बढ़ती परिचालन लागत और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें वर्तमान में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
- युवा और ऊर्जावान नेतृत्व: भारत में छोटे व्यवसायों का नेतृत्व करने वाले उद्यमी सबसे युवा श्रेणी में आते हैं, जहां 56% से अधिक व्यापार मालिकों की आयु 40 वर्ष से कम है।
सीपीए ऑस्ट्रेलिया सर्वे 2025-26: भारतीय लघु उद्योगों की अभूतपूर्व वृद्धि की पृष्ठभूमि
सीपीए ऑस्ट्रेलिया का वार्षिक एशिया-प्रशांत लघु व्यवसाय सर्वेक्षण क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं में एमएसएमई क्षेत्र की नब्ज समझने के लिए एक वैश्विक मानक माना जाता है। इस नवीनतम सर्वेक्षण में कुल 4,166 लघु व्यवसायों को शामिल किया गया था, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 11 प्रमुख बाजारों (जैसे भारत, ऑस्ट्रेलिया, मुख्य भूमि चीन, हांगकांग, मलेशिया, सिंगापुर, वियतनाम आदि) में फैले हुए हैं। भारत में इस सर्वेक्षण के तहत 513 योग्य एमएसएमई मालिकों और प्रबंधकों से विस्तृत इनपुट लिए गए। इस व्यापक सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि में यह बात स्पष्ट होकर सामने आई कि वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं के बावजूद, भारतीय छोटे व्यवसायों ने अपनी आंतरिक मजबूती और अनुकूलन क्षमता के दम पर असाधारण प्रदर्शन किया है।
ऐतिहासिक रूप से, भारत का एमएसएमई (Micro, Small and Medium Enterprises) क्षेत्र देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30% का योगदान देता है और कृषि के बाद रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। कोविड-19 महामारी के दौरान इस क्षेत्र को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा था, जिससे उबरने में इसे लंबा समय लगा। लेकिन वर्ष 2025 का यह सर्वेक्षण दर्शाता है कि भारतीय छोटे व्यवसायों ने न केवल महामारी के प्रभाव को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है, बल्कि वे अब एक नई और अधिक टिकाऊ विकास दर की ओर अग्रसर हैं। भारत के इस शानदार प्रदर्शन का मुख्य कारण घरेलू मांग में मजबूती, मजबूत सरकारी नीतियां, बुनियादी ढांचे का तेजी से हो रहा डिजिटल विकास और वैश्विक बाजारों के साथ बढ़ता एकीकरण है।
सर्वेक्षण का एक अन्य अनूठा पहलू भारतीय उद्यमियों की जनसांख्यिकी है। भारत में 56% व्यावसायिक मालिक 40 वर्ष से कम आयु के हैं, जो कि सर्वेक्षण में शामिल अन्य सभी देशों की तुलना में काफी युवा प्रोफाइल है। यह युवा पीढ़ी तकनीक-प्रेमी है, जोखिम लेने में सक्षम है, और आधुनिक व्यापारिक मॉडलों जैसे ई-कॉमर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपनाने में हिचकिचाती नहीं है। यही कारण है कि भारतीय लघु उद्योगों का प्रदर्शन अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक गतिशील और नवोन्मेषी नजर आ रहा है।
प्रमुख आंकड़े: विकास दर, डिजिटल भुगतान और भविष्य की महत्वाकांक्षाएं
सर्वेक्षण के मुख्य आंकड़े भारतीय छोटे व्यवसायों की सफलता की कहानी को स्पष्ट रूप से बयां करते हैं। वर्ष 2025 के दौरान जहां वैश्विक स्तर पर मंदी और महंगाई की आशंकाएं बनी हुई थीं, वहीं भारत के 80% छोटे व्यवसायों ने वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर्ज की। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के औसत विकास दर (63%) की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है। इसके विपरीत, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के केवल 48% छोटे व्यवसायों ने इस अवधि के दौरान वृद्धि दर्ज की, जो भारत की तेजी को दर्शाता है।
भविष्य के दृष्टिकोण के मामले में भी भारतीय उद्यमी अभूतपूर्व रूप से आशावादी हैं। सर्वे के अनुसार, लगभग 87% भारतीय छोटे व्यवसायों को उम्मीद है कि उनका कारोबार वर्ष 2026 में और अधिक बढ़ेगा। साथ ही, 84% उत्तरदाताओं का मानना है कि भारत की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था 2026 के दौरान मजबूत बनी रहेगी और आगे बढ़ेगी। यह आत्मविश्वास उनके निवेश निर्णयों में भी दिखाई देता है। भारतीय एमएसएमई न केवल भौतिक संपत्तियों में बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्मचारियों के कौशल विकास और नए उत्पादों के अनुसंधान में भारी निवेश कर रहे हैं। इस आत्मविश्वास का सकारात्मक प्रभाव रोजगार बाजार पर भी पड़ा है। 2025 में आधे से अधिक भारतीय व्यवसायों ने अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति की, और 2026 में 69% व्यवसायों ने अधिक कर्मचारियों को काम पर रखने की योजना बनाई है, जो घरेलू रोजगार के दृष्टिकोण से एक बहुत ही सकारात्मक संकेत है।
डिजिटल क्रांति और तकनीकी निवेश: एमएसएमई क्षेत्र का नया इंजन
भारतीय छोटे व्यवसायों के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन का सबसे बड़ा प्रेरक बल डिजिटल तकनीकों का व्यापक रूप से अपनाया जाना है। भारत सरकार द्वारा शुरू की गई डिजिटल इंडिया (Digital India) पहल और एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस (UPI) जैसी क्रांतिकारी भुगतान प्रणालियों ने एमएसएमई क्षेत्र के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। सीपीए ऑस्ट्रेलिया सर्वे के अनुसार, भारत के 89% लघु उद्यमों ने अपने कुल बिक्री राजस्व का 10% से अधिक हिस्सा डिजिटल भुगतान प्रणालियों के माध्यम से प्राप्त किया। यह दर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है, जो यह साबित करती है कि भारतीय उपभोक्ता और व्यापारी दोनों ही नकद रहित लेनदेन को तेजी से अपना चुके हैं।
इसके साथ ही, इंटरनेट के बढ़ते प्रसार ने पारंपरिक व्यापारिक सीमाओं को समाप्त कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, 74% भारतीय छोटे व्यवसाय ऑनलाइन बिक्री (E-commerce) के माध्यम से अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा कमाते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, डिजिटल मार्केटिंग और कूरियर निर्यात के नियमों में दी गई छूट ने स्थानीय छोटे दुकानदारों, कारीगरों और निर्माताओं को सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों से जोड़ दिया है। इसके अलावा, भारतीय एमएसएमई आधुनिक तकनीकों में भी निवेश बढ़ा रहे हैं। वर्ष 2025 के दौरान लगभग 36% भारतीय छोटे व्यवसायों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उपकरणों, क्लाउड कंप्यूटिंग और ग्राहक संबंध प्रबंधन (CRM) सॉफ्टवेयर में सक्रिय रूप से निवेश किया है। यह तकनीकी निवेश न केवल उनके परिचालन को अधिक कुशल बना रहा है, बल्कि लागत में कमी लाने और उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार करने में भी मदद कर रहा है।
तकनीक के इस उपयोग ने छोटे उद्यमों को अपनी वित्तीय प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने और औपचारिक ऋण प्रणालियों तक आसान पहुंच प्राप्त करने में भी मदद की है। जब व्यवसाय डिजिटल माध्यमों से भुगतान स्वीकार करते हैं, तो उनका डिजिटल ट्रैक रिकॉर्ड मजबूत होता है, जिससे बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए उनकी साख का आकलन करना आसान हो जाता है। यह डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र आने वाले वर्षों में भारतीय एमएसएमई क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास की आधारशिला साबित होने वाला है।
चुनौतियां और संकट: परिचालन लागत और वैश्विक दबावों का सामना
शानदार विकास दर और डिजिटल अनुकूलनशीलता के बावजूद, भारतीय लघु उद्योगों का मार्ग चुनौतियों से रहित नहीं है। सर्वेक्षण में शामिल भारतीय उद्यमियों ने कुछ गंभीर समस्याओं की ओर भी इशारा किया है जो उनके मुनाफे पर दबाव डाल रही हैं। सबसे बड़ी चिंता बढ़ती परिचालन लागत (Operating Costs) को लेकर है। लगभग 42% उत्तरदाताओं ने परिचालन लागत में बढ़ोतरी को अपने व्यवसाय की वृद्धि में सबसे बड़ा अवरोध माना। कच्चे माल की कीमतें, बिजली और ईंधन की दरें, परिवहन शुल्क और कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि जैसी ताकतों ने छोटे व्यवसायों के मार्जिन को संकुचित कर दिया है। विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र के छोटे उद्यमों के लिए लागत नियंत्रण एक दैनिक चुनौती बन चुका है।
"सरकार की विकास-उन्मुख नीतियों, डिजिटलीकरण के व्यापक प्रसार और मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात बाजारों तक पहुंच के कारण भारतीय एमएसएमई ने पिछले वर्ष अभूतपूर्व जुझारूपन और आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया है। वे अब अधिक संगठित होकर 2026 में बड़े विस्तार की महत्वाकांक्षा के साथ कदम बढ़ा रहे हैं।" — अनिकेत तलाती, चार्टर्ड एकाउंटेंट (CPA) और भारत में सीपीए ऑस्ट्रेलिया के प्रवक्ता (2026)
इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऑर्डर पाइपलाइनों में अस्थिरता ने निर्यात-उन्मुख लघु व्यवसायों के लिए अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऊर्जा और रसद (Logistics) की बढ़ती लागत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय एमएसएमई उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित किया है। इसके अलावा, कुशल श्रम बल (Skilled Labor) की कमी और नई तकनीकों को अपनाने के लिए आवश्यक पूंजी की व्यवस्था करना भी छोटे उद्यमियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यद्यपि वे निवेश करना चाहते हैं, लेकिन कई बार ब्याज दरों में वृद्धि और कड़े ऋण नियमों के कारण उन्हें समय पर धन जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सरकारी नीतियां और बजटीय सहयोग: 10,000 करोड़ रुपये का नया रोडमहप
भारतीय लघु उद्योग क्षेत्र की इन समस्याओं को दूर करने और उनके विकास को निरंतरता प्रदान करने के लिए भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (Ministry of MSME) ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने एमएसएमई क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक विशेष त्रिपक्षीय योजना (Three-pronged Strategy) पेश की है, जो मुख्य रूप से इक्विटी (Equity), लिक्विडिटी (Liquidity) और व्यावसायिक सहायता (Professional Support) पर केंद्रित है।
- ₹10,000 करोड़ का एसएमई ग्रोथ फंड (SME Growth Fund): इसका उद्देश्य तेजी से बढ़ते छोटे व्यवसायों को इक्विटी सहायता प्रदान करना है ताकि वे बड़े कॉर्पोरेट के रूप में विकसित हो सकें।
- स्व-निर्भर भारत (SRI) फंड में वृद्धि: इस फंड में अतिरिक्त ₹2,000 करोड़ का योगदान दिया गया है ताकि छोटे व्यवसायों को संकट के समय वित्तीय सहायता प्रदान की जा सके।
- ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) का विस्तार: केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) द्वारा एमएसएमई से की जाने वाली सभी खरीद का निपटान अब अनिवार्य रूप से इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किया जाएगा, जिससे छोटे व्यवसायों का अटका हुआ पैसा समय पर मिल सकेगा।
इसके अतिरिक्त, सरकार ने लघु उद्योगों के लिए ऋण गारंटी योजनाओं को मजबूत किया है। सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) के तहत बिना किसी कोलेटरल (Collateral) के दिए जाने वाले ऋण की सीमा को बढ़ाया गया है। साथ ही, डिजिटल औपचारिकताओं को बढ़ावा देने के लिए उद्यम पोर्टल (Udyam Registration Portal) पर पंजीकृत सूक्ष्म उद्यमियों के लिए 10 लाख विशेष क्रेडिट कार्ड जारी किए गए हैं, जिसकी व्यक्तिगत सीमा ₹5 लाख तक है। कूरियर निर्यात के नियमों को सरल बनाते हुए ₹10 लाख प्रति कंसाइनमेंट की सीमा को समाप्त कर दिया गया है, जिससे छोटे हस्तशिल्प और कपड़ा निर्माताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सीधे सामान बेचना आसान हो गया है। ये सभी उपाय भारतीय एमएसएमई क्षेत्र को एक संगठित और उच्च-विकास वाले पारिस्थितिकी तंत्र में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम एशिया-प्रशांत (APAC) और ऑस्ट्रेलिया
भारतीय छोटे व्यवसायों के प्रदर्शन की वैश्विक स्थिति को समझने के लिए, सीपीए ऑस्ट्रेलिया के सर्वेक्षण के आधार पर भारत, संपूर्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र और ऑस्ट्रेलिया के प्रदर्शन का तुलनात्मक विश्लेषण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है:
| व्यापारिक मानदंड (Business Parameter) | भारत (India) - 2025 | एशिया-प्रशांत औसत (APAC Avg) | ऑस्ट्रेलिया (Australia) - 2025 | तुलनात्मक स्थिति (Status) |
|---|---|---|---|---|
| 2025 में व्यापार वृद्धि (Business Growth) | 80% कंपनियां | 63% औसत | 48% कंपनियां | ▲ Leading (भारत सबसे आगे) |
| 2026 में वृद्धि की उम्मीद (Growth Expectation) | 87% उद्यमी | 70% औसत | 52% उद्यमी | ▲ Leading (भारत सबसे आगे) |
| डिजिटल भुगतान स्वीकार करना (>10% राजस्व) | 89% व्यवसाय | 75% औसत | 56% व्यवसाय | ▲ Leading (भारत सबसे आगे) |
| 2025 में नई नियुक्तियां (Hiring Staff) | 50% से अधिक | 38% औसत | 22% व्यवसाय | ▲ Leading (भारत सबसे आगे) |
| आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश | 36% कंपनियां | 24% औसत | 12% कंपनियां | ▲ Leading (भारत सबसे आगे) |
इस तालिका से स्पष्ट होता है कि विकास दर, तकनीकी निवेश और रोजगार सृजन जैसे सभी प्रमुख मानकों पर भारतीय छोटे व्यवसाय अपने वैश्विक और क्षेत्रीय समकक्षों से काफी आगे हैं। जहां ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित बाजारों में छोटे व्यवसाय बढ़ती ब्याज दरों, धीमी उपभोक्ता मांग और सुस्त उत्पादकता के कारण संघर्ष कर रहे हैं, वहीं भारतीय एमएसएमई ने अपनी युवा जनसांख्यिकी और डिजिटल टूल्स के आक्रामक उपयोग के माध्यम से खुद को एक अग्रणी स्थिति में स्थापित कर लिया है। यह तुलना दर्शाती है कि आने वाले समय में वैश्विक विकास का इंजन पश्चिमी देशों के बजाय भारत जैसी उभरती हुई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित हो रहा है।
भविष्य का मार्ग और निष्कर्ष: भारतीय एमएसएमई के लिए आगे की राह
सीपीए ऑस्ट्रेलिया सर्वेक्षण के निष्कर्ष भारतीय लघु उद्योगों के लिए एक उज्ज्वल और आशाजनक भविष्य की ओर इशारा करते हैं। हालांकि, इस सकारात्मक गति को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उद्यमी और नीति निर्माता दोनों मिलकर काम करें। परिचालन लागत में वृद्धि और वैश्विक अनिश्चितता जैसी अल्पकालिक चुनौतियों से निपटने के लिए नवाचार और उत्पादकता में निरंतर सुधार की आवश्यकता होगी। भारतीय छोटे व्यवसायों को केवल घरेलू बाजार पर निर्भर रहने के बजाय निर्यात के नए अवसरों को तलाशना चाहिए, जिसके लिए सरकार द्वारा हाल ही में किए गए नीतिगत बदलाव और मुक्त व्यापार समझौते एक बेहतरीन मंच प्रदान करते हैं।
"सर्वेक्षण के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अन्य अर्थव्यवस्थाएं तकनीकी अनुकूलन, निवेश और उत्पादकता वृद्धि के मामले में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। भारतीय लघु उद्योगों ने इन सभी मानकों पर खुद को ढालकर और डिजिटल उपकरणों में निवेश करके एक शानदार उदाहरण पेश किया है।" — गेवन ऑर्ड, बिजनेस एंड इन्वेस्टमेंट लीड, सीपीए ऑस्ट्रेलिया (2026)
अंततः, भारतीय लघु उद्योग (MSMEs) केवल आजीविका का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे अब भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य के प्रमुख सारथी बन चुके हैं। उनकी यह रिकॉर्ड विकास दर, तकनीकी नेतृत्व और युवाओं की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि वे आने वाले वर्षों में भी देश के आर्थिक विकास की रीढ़ बने रहेंगे। यदि समय पर वित्तीय संसाधन, उचित नीतिगत प्रोत्साहन और निरंतर तकनीकी प्रशिक्षण मिलता रहे, तो भारतीय लघु उद्योग न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी सफलता के नए झंडे गाड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
- सीपीए ऑस्ट्रेलिया एशिया-प्रशांत लघु व्यवसाय सर्वेक्षण (16वां और 17वां संस्करण) - cpaaustralia.com.au
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (Ministry of MSME), भारत सरकार - msme.gov.in
- पत्र सूचना कार्यालय (PIB), भारत सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्तियां
- द इकोनॉमिक टाइम्स (The Economic Times) - लघु व्यवसाय और एमएसएमई रिपोर्टिंग