भारत-यूके CETA ऐतिहासिक समझौता: 15 जुलाई से शुरू होगा नया व्यापार युग — जानें 99% शुल्क मुक्ति, $120 बिलियन का लक्ष्य और आईटी पेशेवरों को $500 मिलियन की बचत

भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के व्यापारिक संबंधों में एक ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत होने जा रही है। दोनों देशों के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) तथा सामाजिक सुरक्षा समझौता (DCC) 15 जुलाई 2026 से पूर्ण रूप से लागू होने जा रहे हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी का एक नया मील का पत्थर बताया है। इस समझौते के लागू होने से भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले 99% उत्पादों पर आयात शुल्क पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा, जिससे भारतीय कपड़ा, चमड़ा और विनिर्माण उद्योगों को वैश्विक स्तर पर बड़ी बढ़त मिलेगी। इसके साथ ही, आईटी क्षेत्र के पेशेवरों को सामाजिक सुरक्षा कर के दोहरे भुगतान से मुक्ति मिलेगी, जिससे वार्षिक रूप से $500 मिलियन (लगभग ₹4,100 करोड़) की बड़ी बचत होगी।

India UK CETA Trade Agreement भारत-यूके व्यापार समझौता: नए द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों का मार्ग प्रशस्त
महत्वपूर्ण बिंदु (Key Takeaways):
  • भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता (CETA) और सामाजिक सुरक्षा समझौता (DCC) 15 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगे।
  • ब्रिटेन में भारत के 99% टैरिफ लाइन्स (वस्तुओं के वर्गों) को तत्काल शून्य-शुल्क (Duty-Free) पहुंच प्राप्त होगी।
  • दोहरे सामाजिक सुरक्षा कर में छूट की अवधि को बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है, जिससे 75,000 भारतीय पेशेवर लाभान्वित होंगे।
  • दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक आपसी व्यापार को दोगुना कर $120 बिलियन (120 अरब डॉलर) तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।

भारत-यूके द्विपक्षीय व्यापार का नया रोडमैप और $120 बिलियन का लक्ष्य

भारत और यूनाइटेड किंगडम ने अपनी आर्थिक क्षमता का पूर्ण दोहन करने के लिए 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर $120 बिलियन तक पहुंचाने की रणनीति तैयार की है। वर्तमान में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग $38 बिलियन के स्तर पर है। इस नए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के माध्यम से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में तीव्र विकास की उम्मीद है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 25 से 27 जून 2026 तक लंदन की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर हैं, जहां वे ब्रिटेन के व्यापार मंत्रियों और प्रमुख उद्योगपतियों के साथ मिलकर 15 जुलाई के सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक प्रशासनिक और विनियामक तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को आसान बनाने और दोनों देशों के बीच निवेश को गति देने के लिए संयुक्त कार्य समूह के रोडमैप पर अंतिम मुहर लगाई जा रही है।

$120 Billion वर्ष 2030 तक व्यापार का लक्ष्य
99% शून्य आयात शुल्क वाली वस्तुएं
$500 Million वार्षिक सामाजिक सुरक्षा कर की बचत

इस समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था के कई श्रम-सघन (Labor-Intensive) क्षेत्रों को अप्रत्याशित बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। भारतीय निर्यातकों को अब तक ब्रिटेन के बाजार में अन्य प्रतिस्पर्धी देशों (जैसे वियतनाम और बांग्लादेश) की तुलना में उच्च आयात शुल्कों का सामना करना पड़ता था, लेकिन 99% टैरिफ लाइनों पर शुल्क समाप्त होने से भारत के कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण, खिलौने और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में भारी वृद्धि होगी।

श्रम-सघन क्षेत्रों पर विस्तृत प्रभाव: कपड़ा, चमड़ा और आभूषण

भारतीय श्रम-सघन विनिर्माण क्षेत्र के लिए ब्रिटेन एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाजार रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय कपड़ा और परिधान (Apparel) निर्यातकों को यूके में लगभग 8% से 12% तक के उच्च आयात शुल्क का सामना करना पड़ता था, जिसके कारण बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे अल्पविकसित देशों को ब्रिटिश बाजार में भारत पर बढ़त हासिल थी। CETA के 15 जुलाई 2026 से प्रभावी होने के बाद, यह शुल्क घटकर तत्काल 0% हो जाएगा। इससे भारतीय परिधान उद्योग के लिए करोड़ों रुपये की वित्तीय लागत कम होगी और घरेलू स्तर पर कताई, बुनाई और गारमेंटिंग इकाइयों में नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

इसी प्रकार, चमड़ा और फुटवियर (Leather & Footwear) तथा रत्न एवं आभूषण (Gems & Jewellery) उद्योग भी इस शुल्क कटौती से बड़े लाभार्थी बनकर उभरेंगे। भारत के चमड़े के सामानों की गुणवत्ता की यूके में भारी मांग है। आयात शुल्क के शून्य होने से भारतीय हस्तशिल्पियों और चर्मकारों को अपने उत्पादों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेचने का अवसर मिलेगा। इसके अतिरिक्त, विनिर्मित रासायनिक उत्पादों, ऑटो घटकों और खिलौना निर्माण से जुड़ी भारतीय एमएसएमई (MSME) इकाइयां भी ब्रिटेन के विशाल रिटेल और औद्योगिक नेटवर्क से जुड़ सकेंगी।

Double Contribution Convention (DCC): भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए बड़ा वरदान

व्यापार समझौते के साथ-साथ दोनों देशों ने सामाजिक सुरक्षा कन्वेंशन (DCC) को भी अंतिम रूप दिया है, जो सेवा क्षेत्र और विशेष रूप से भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। वर्तमान नियमों के तहत, जब कोई भारतीय पेशेवर किसी परियोजना के लिए अस्थाई रूप से ब्रिटेन जाता है, तो उसे भारत में सामाजिक सुरक्षा (PF) में योगदान देने के साथ-साथ ब्रिटेन में भी नेशनल इंश्योरेंस (National Insurance) का भुगतान करना पड़ता था, जबकि वह वहां की सामाजिक सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए पर्याप्त समय तक नहीं रुकता था।

नए समझौते के अनुसार, भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में इस दोहरे सामाजिक सुरक्षा योगदान से पूरी तरह छूट दी जाएगी। इस छूट की अवधि को बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। आंकड़ों के अनुसार, इस कदम से सालाना 75,000 से अधिक भारतीय आईटी पेशेवर और 900 से अधिक भारतीय कंपनियां सीधे तौर पर लाभान्वित होंगी। इससे भारतीय टेक कंपनियों के संचालन खर्च में कमी आएगी और उनकी सेवाएं अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगी।

महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव: सामाजिक सुरक्षा दोहरे कर से मिलने वाली छूट से भारतीय कंपनियों को सालाना लगभग $500 मिलियन की बचत होगी। यह अतिरिक्त पूंजी भारतीय आईटी और सेवा कंपनियों द्वारा अनुसंधान, विकास और भारत में ही नए रोजगार के अवसर पैदा करने में उपयोग की जा सकेगी।

DCC का तकनीकी पहलू: दोहरे योगदान से मुक्ति का गणित

तकनीकी दृष्टिकोण से, जब कोई भारतीय आईटी कर्मचारी किसी ब्रिटिश क्लाइंट की साइट पर अल्पावधि (Short-Term Deployment) के लिए नियुक्त होता था, तो उसे अपनी कुल आय का लगभग 8% से 12% हिस्सा नेशनल इंश्योरेंस स्कीम के तहत ब्रिटेन सरकार को देना होता था। इसके अतिरिक्त, भारतीय आईटी नियोक्ता को भी लगभग 13.8% का योगदान नियोक्ता के हिस्से के रूप में चुकाना होता था। चूंकि ये कर्मचारी परियोजना समाप्ति के बाद वापस भारत लौट आते थे, इसलिए उन्हें इस भुगतान की एवज में कभी भी कोई पेंशन या सामाजिक लाभ प्राप्त नहीं होता था, जिससे यह राशि एक अतिरिक्त कर बोझ बन जाती थी।

नया डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC) इस समस्या का पूर्ण समाधान करता है। इस समझौते के लागू होने के बाद, भारतीय कंपनियों को केवल अपने देश के कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) से एक 'कवरेज प्रमाणपत्र' (Certificate of Coverage) प्राप्त करना होगा। इस प्रमाणपत्र को यूके के कर विभाग (HMRC) में जमा करने के बाद, कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को ही नेशनल इंश्योरेंस कर के भुगतान से 5 वर्षों के लिए पूर्ण छूट मिल जाएगी। यह सुव्यवस्थित प्रक्रिया प्रशासनिक जटिलताओं को कम करेगी और मध्यम श्रेणी के आईटी सेवा प्रदाताओं को यूके में अपने केंद्र खोलने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

सेवा क्षेत्र का विस्तार और व्यावसायिक गतिशीलता

भारत-यूके समझौता केवल माल (Goods) के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेवा क्षेत्र (Services Sector) में भी ऐतिहासिक पहुंच प्रदान करता है। CETA के तहत कुल 137 उप-क्षेत्रों (Sub-sectors) को कवर किया गया है। इनमें सूचना प्रौद्योगिकी (IT), वित्तीय सेवाएं, पेशेवर सेवाएं (जैसे कानूनी और लेखांकन परामर्श), शिक्षा, दूरसंचार, वास्तुकला और इंजीनियरिंग प्रणालियां शामिल हैं।

समझौते के अंतर्गत पेशेवरों की गतिशीलता को सरल बनाने के लिए एक विशेष ढांचा तैयार किया गया है। इसके तहत कांट्रेक्चुअल सर्विस सप्लायर्स (Contractual Service Suppliers), बिजनेस विजिटर्स और इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी के लिए वीजा प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाया गया है। इससे दोनों देशों के बीच प्रतिभाओं का आदान-प्रदान सुगम होगा और भारतीय चिकित्सकों, इंजीनियरों और शिक्षकों के लिए ब्रिटेन में अल्पकालिक अनुबंधों पर काम करना आसान हो जाएगा। इसके अलावा, ब्रिटिश विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस स्थापित करने की प्रक्रिया में भी सहयोग दिया जाएगा।

द्विपक्षीय निवेश और मेक इन इंडिया: रणनीतिक सहयोग

यह समझौता न केवल व्यापार को सरल बनाता है बल्कि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को भी गति प्रदान करता है। समझौते के तहत रणनीतिक क्षेत्रों जैसे कि फार्मास्यूटिकल्स, हरित ऊर्जा (Green Energy), हाइड्रोजन पावर, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), और सेमीकंडक्टर निर्माण में दोनों देशों के बीच नई संयुक्त भागीदारी (Joint Ventures) स्थापित की जा सकेगी। ब्रिटेन की बड़ी निवेश कंपनियां और पेंशन फंड भारत के विनिर्माण बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश करने की योजना बना रहे हैं, जिससे भारत सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान को बल मिलेगा।

इसके अतिरिक्त, खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) और कृषि तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा। भारतीय किसानों और सहकारी समितियों को यूके की आधुनिक कोल्ड-चेन तकनीक और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञता का लाभ मिलेगा। इससे खेतों से बाजारों तक खाद्यान्न के नुकसान को कम किया जा सकेगा और भारतीय कृषि निर्यात की गुणवत्ता को यूरोपीय मानकों के अनुकूल बनाया जा सकेगा।

उद्गम के नियम (Rules of Origin): गुणवत्ता और सुरक्षा के मानक

किसी भी मुक्त व्यापार समझौते में सबसे संवेदनशील हिस्सा 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' (उद्गम के नियम) होता है। CETA के तहत दोनों देशों ने बेहद सख्त और स्पष्ट नियम तय किए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई तीसरा देश (जैसे चीन या कोई अन्य एशियाई देश) अपने उत्पादों को केवल लेबल बदलकर भारत या ब्रिटेन के रास्ते शून्य-शुल्क पर न भेज सके।

समझौते के नियमों के अनुसार, किसी भी उत्पाद को शून्य-शुल्क का लाभ प्राप्त करने के लिए उसमें कम से कम 35% से 45% तक का स्थानीय मूल्य संवर्धन (Local Value Addition) होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, विनिर्माण प्रक्रिया के दौरान उत्पाद के टैरिफ क्लासिफिकेशन में बड़ा बदलाव (Change in Tariff Classification) होना आवश्यक है। इन कड़े नियमों के कारण भारत के वास्तविक विनिर्माताओं को सुरक्षा प्राप्त होगी और घरेलू उद्योगों का संरक्षण सुनिश्चित रहेगा।

भारत-यूके CETA समझौते का तुलनात्मक विश्लेषण

नीचे दी गई तालिका में CETA लागू होने से पूर्व और बाद की स्थितियों का स्पष्ट तुलनात्मक विवरण दिया गया है:

व्यापार पैरामीटर CETA से पहले की स्थिति CETA के बाद की स्थिति (15 जुलाई से) प्रभाव एवं लाभ स्तर
आयात शुल्क (Export Tariffs to UK) औसत 9.6% तक का शुल्क 99% वस्तुओं पर शून्य-शुल्क (0% ड्यूटी) ▲ उच्च लाभ
सामाजिक सुरक्षा (Social Security) भारत और यूके दोनों जगह दोहरा भुगतान 5 वर्षों के लिए केवल भारत में एकल भुगतान ▲ उच्च लाभ
द्विपक्षीय व्यापार मूल्य (Trade Value) $38 बिलियन (वार्षिक लगभग) $120 बिलियन (2030 तक का लक्ष्य) ▲ उच्च लाभ
सेवा क्षेत्र में पहुंच (Services Sub-sectors) सीमित और जटिल विनियम 137 उप-क्षेत्रों में पूर्ण और खुली पहुंच ≈ मध्यम लाभ
व्यावसायिक आवागमन (Visa Mobility) लंबी और जटिल वीजा प्रक्रिया सरल और सुव्यवस्थित प्रवेश प्रणाली ≈ मध्यम लाभ

आधिकारिक वक्तव्य और रणनीतिक प्रतिक्रियाएं

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने इस ऐतिहासिक समझौते के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है:

"यह समझौता भारतीय विनिर्माताओं, किसानों और हमारे शानदार आईटी पेशेवरों के लिए स्वर्णिम युग की शुरुआत है। 15 जुलाई से जब 99% निर्यात उत्पादों पर शुल्क समाप्त होगा, तब हमारे कपड़ा और एमएसएमई (MSME) क्षेत्र को वैश्विक बाजारों में एक बड़ी प्रतिस्पर्धी बढ़त मिलेगी। Double Contribution Convention के तहत मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा छूट हमारे पेशेवर कौशल की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।" — पीयूष गोयल, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री

यूनाइटेड किंगडम के विज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी सचिव श्री पीटर काइल ने भी इस समझौते पर सकारात्मक रुख व्यक्त करते हुए कहा था:

"भारत और ब्रिटेन के बीच साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, यह नवाचार और भविष्य की तकनीकों का एक साझा मंच है। CETA और सामाजिक सुरक्षा समझौते के क्रियान्वयन से दोनों देशों के व्यवसायों को प्रतिभाओं के निर्बाध उपयोग की स्वतंत्रता मिलेगी। इससे दोनों देशों में नवाचार की गति तेज होगी और रोजगार के लाखों नए अवसर सृजित होंगे।" — पीटर काइल, सचिव (विज्ञान और प्रौद्योगिकी), यूके सरकार

द्विपक्षीय व्यापार वृद्धि प्रक्षेपण: 2030 का रोडमैप

नीचे दिए गए चार्ट में 15 जुलाई 2026 को CETA लागू होने के बाद से वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार वृद्धि के अनुमानित और लक्षित आंकड़ों को दर्शाया गया है:

ऐतिहासिक तुलना: अन्य व्यापार समझौतों से तुलना

यदि हम इस समझौते की तुलना भारत द्वारा हाल ही में हस्ताक्षरित अन्य समझौतों से करें, जैसे कि भारत-यूएई व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) या भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता (ECTA), तो भारत-यूके CETA कई मायनों में अनूठा है। यूएई समझौते में जहां मुख्य ध्यान कच्चे तेल, आभूषणों और ऊर्जा क्षेत्र पर था, वहीं यूके समझौते में ध्यान वैज्ञानिक नवाचार, सेवा क्षेत्र और श्रम-सघन विनिर्माण पर केंद्रित है।

यूके समझौते में शामिल सामाजिक सुरक्षा छूट (DCC) अब तक की सबसे प्रगतिशील द्विपक्षीय सामाजिक नीतियों में से एक है। यह वैश्विक मोबिलिटी को सुगम बनाकर भारतीय स्टार्टअप्स और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सेवा लागत को नियंत्रित रखने में अभूतपूर्व सहायता देगी। यह दिखाता है कि भारत अब केवल एक विनिर्माण केंद्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता बनकर उभर रहा है।

निष्कर्ष और भारतीय व्यापार के लिए भावी राह

अंततः, 15 जुलाई 2026 से लागू होने वाला भारत-यूके CETA समझौता देश के निर्यात परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखता है। एमएसएमई, कपड़ा निर्यातकों और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को इस अवसर का लाभ उठाने के लिए अभी से रणनीतियां तैयार करनी होंगी। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पादों की गुणवत्ता को बनाए रखना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए तकनीकी उन्नयन करना भारतीय व्यापार जगत के लिए अगला बड़ा कदम होना चाहिए।

यह ऐतिहासिक समझौता भारत को एक नई आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 140 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले इस देश के उद्यमियों को अब पश्चिमी बाजारों में पैर पसारने का एक अभूतपूर्व अवसर मिला है, जो आने वाले दशकों में भारत की जीडीपी विकास दर को और मजबूत करेगा।

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